सामाजिक समरसता की अग्रणी पहल थी ‘मंडल विचार’ मासिक पत्रिका

नई दिल्ली, 6 नवंबर 2003 को सामाजिक समरसता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जाने वाली ‘मंडल विचार’ मासिक पत्रिका के प्रवेशांक का लोकार्पण नई दिल्ली स्थित संविधान क्लब के स्पीकर हाल में पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर सिंह ने मंडल आयोग की अनुशंसाओं के क्रियान्वयन के बाद उत्पन्न सामाजिक परिस्थितियों पर अपने विचार रखे तथा मंडल को महज़ आरक्षण की नीति नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक विचार के रूप में समझने पर बल दिया था। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार राजेंद्र यादव ने की थी। पत्रिका के संपादक श्यामल किशोर यादव तथा प्रकाशक युवा उद्यमी राकेश रोशन थे। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार सुधीर हिलसायन ने किया था।

अपने उद्बोधन में वी. पी. सिंह ने कहा था कि वर्ण आधारित सामाजिक संरचना ने समाज को दो स्तरों पर क्षतिग्रस्त किया है—एक ओर इसने शोषित वर्ग के जीवन को अपमानजनक बनाया, वहीं दूसरी ओर शोषक वर्ग को संवेदनहीन करने का काम भी किया। उन्होंने संदर्भ में ‘टेलिफोन डायरेक्टरी’ को सत्ता-सूचकांक बताते हुए संकेत किया कि महत्वपूर्ण पदों पर आज भी अगड़ी जातियों का वर्चस्व है। उनके अनुसार मीडिया, निजी क्षेत्र सहित सत्ता प्रतिष्ठानों पर यह वर्चस्व सामाजिक संतुलन के लिए चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने ‘मंडल विचार’ जैसी पत्रिका के प्रकाशन को एक महत्वपूर्ण शुरुआत बताते हुए सामाजिक संवाद के विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया।

राजेंद्र यादव ने अपने वक्तव्य में मंडल आंदोलन के संकुचित रूप से प्रस्तुत किए जाने की विडंबना पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन कुछ विशेष जातियों के दायरे में सिमट गया, जबकि इसका उद्देश्य व्यापक सामाजिक न्याय था। उनकी दृष्टि में मंडल के बाद कुछ मध्य जातियों ने स्वयं को स्वतंत्र ही नहीं, बल्कि निरंकुश भी मान लिया, जिसके परिणामस्वरूप आंदोलन की दिशा आंशिक रूप से प्रभावित हुई।

पत्रिका के संपादक श्यामल किशोर यादव ने स्वागत वक्तव्य में पत्रिका के प्रकाशन को लेखक की ‘‘मानसिक प्रसव पीड़ा के उपरांत जन्म’’ जैसा क्षण बताया। उन्होंने कहा कि ‘मंडल विचार’ सामाजिक समरसता का संदेश लेकर आई है और संवाद की नई राहें खुलेगी। वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने अपने संबोधन में हिंदी क्षेत्र में नेतृत्व शून्यता के कारण उत्पन्न स्थिति पर चिंता व्यक्त की तथा दलितों, पिछड़ों और शोषित वर्गों के साझा मंच निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया।

44 पृष्ठों की यह पत्रिका समाचार एवं विश्लेषण की श्रेणी में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करने की क्षमता रखती है। प्रवेशांक में आरक्षण लागू होने के बाद के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों की विस्तृत विवेचना की गई है। साथ ही भाजपा सहित अन्य दलों द्वारा आरक्षण व्यवस्था में हस्तक्षेप अथवा परिवर्तन की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला गया है। प्रवेशांक का संपादकीय मंडल पश्चात परिस्थितियों पर केंद्रित है। पत्रिका में कहानी, कविता, लघु कथा, पुस्तक समीक्षा सहित विभिन्न सांस्कृतिक सामग्री भी सम्मिलित है, जो इसकी विषय-वस्तु को संतुलित व समृद्ध बनाती है।

‘मंडल विचार’ पत्रिका का प्रकाशन सामाजिक न्याय एवं समरसता के विमर्श को नए आयाम देने का प्रयास है। लोकार्पण समारोह न केवल मंडल आंदोलन की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पुनर्समीक्षा का अवसर रहा, बल्कि इससे भविष्य में बहुस्तरीय संवाद और विचार-विमर्श की धाराओं के सशक्त होने की उम्मीद भी व्यक्त की गई।